यह स्वेत वर्ण का प्रकाशमान पिघली हुई चाँदी की तरह भारी द्रव्य है सब घातुओं को,लौह छोड़कर अपने में मिला लेता है। वृद्धवस्था,कफ व शरीरगत विषम रोगों को नष्ट करने के लिए इसका प्रयोग औषधि रूप में किया जाता है। पारद, रस, रसेन्द्र, सूतक मिश्रक आदि नामों से जाना जाता है। सभी धातुओं का तेज इसमें मिश्रित होने के कारण इसका नाम मिश्रक पड़ा। अशुद्ध पारद धूम्रवर्ण का देखने में चित्र विचित्र रंग का पाण्डूवर्ण का दिखाई देता है। औषधि निर्माण में पारद को शोधित करके ही प्रयोग में लेना चाहिए। अतएव श्री शर्मा आयुर्वेद मन्दिर में पारे का शोधन शास्त्रोक्त विधि विधान से निम्न प्रकार से किया जाता है। सर्वप्रथम पारे को सात बार महीन कपडे से छान लेते है। पुनः अष्ट संस्कार द्वारा शोधित किया जाता है।

1. स्वेदन संस्कार
स्वेदन संस्कार के लिए जितना पारा ले उसका सोलहवाँ भाग प्रत्येक सोंठ, पीपल, मिर्च, सेंधा नमक, राई और चित्रक लेकर इन सब को कूट-कपड़छान कर बारीक चूर्ण करते है ततपश्चात आर्द्रक और मूली के रस में उपरोक्त चूर्ण मिलाकर पारद को घोटें। इस मिश्रण को जब तक खरल करे जब तक कि गोला न बन जाए। इसके बाद चार स्वच्छ कपड़े के चार पर्त कर उसमें गोले को रखकर पोटली बाँधकर काँजी भरे हुए मिट्टी के पात्र में इस गोले को (दोलन यंत्र में) लटकाकर चूल्हे पर चढ़ा मध्यमाग्नि द्वारा तीन दिन तक स्वेदन करते है।यदि काँजी कम हो जाए तो दुबारा डाल देते है। इस प्रकिया के पश्चात पारद को काँजी से निकालकर अच्छी तरह धो लेत है।
स्वेदन संस्कार के लाभ- स्वेदन संस्कार द्वारा पारे के दोषों को शिथिल किया जाता है। श्थिलता दूर होकर पारद में तीव्रता आ जाती है।

2. मर्दन संस्कार
स्वेदन संस्कार किये हुए पारद से सोलहवाँ भाग, मर्दन संस्कार की औषधियाँ(घर का धुआँ, ईट का चूर्ण , दही, गुड़, सेंधा नमक और राई) प्रत्येक को अलग-अलग लेकर महीन चूर्ण करके कपड़े से छान लेते है फिर इस चूर्ण तथा तरल द्रव्यों के साथ पारद को खरल में डालकर तीन दिन तक घोंटते है। इसके बाद गर्म काँजी से धोकर पारद को अलग कर लेते है।
मर्दन संस्कार के लाभ- मर्दन संस्कार द्वारा पारद का बाहरी मल नष्ट होकर शुद्ध और स्वच्छ हो जाता है।

3. मूर्च्छन संस्कार
मर्दन किये हुए पारद को त्रिफला और चित्रकमूल प्रत्येक षोडशांश चूर्ण के साथ खरल में डालकर घृतकुमारी के स्वरस में 7 दिन तक घोंटने से मल-दोष, अग्नि दोष, विष दोष, नष्ट हो जाता है।इस प्रकार पारद उपयुक्त सभी द्रव्यों के साथ पृथक-2 घोंटने से मूर्छन संस्कार हो जाता है।
मूच्छन संस्कार के लाभ- मूच्छन संस्कार से मल, वन्हि तथा विष-दोष नष्ट हो जाता है।

4. उत्थापन संस्कार
मूर्च्छन संस्कार से पारद पिष्टी के रूप में प्राप्त होता है इसे अपने स्वरूप में लाने के लिए इसका उत्थापन करना चाहिए। मूर्च्छन संस्कार से प्राप्त पारे को खरल में डालकर जम्बीरी नींबू के रस के साथ तेज धूप में तीन धण्टे तक खरल में घोटते है उसके बाद स्वच्छ कपडे से छानकर गर्म जल से धो लेते है। इससे पारद का उत्थापन हो जाता है।

5. पातन संस्कार-
(अ) उर्ध्वपातन
एक खरल में उत्थापित पारद तीन भाग और ताम्र चूर्ण एक भाग डालकर इन दोनों को नींबू के रस से जब तक मर्दन करें जब तक कि गोला न बन जाए। इस गोले को हांडी में रख कर दूसरी हांडी इसके उपर रख कर संधि लेप करके सुखा लेते हैं नीचे की हांडी की तली में मिट्टी का लेप लगाते है। फिर इस डमरू यंत्र को चूल्हे में चढाकर तीन प्रहर मध्यमाग्नि आंच देते है।पास में एक पात्र में शीतल जल भरकर रखे उसमें 4 पर्त किये हुए कपडे जल में भिंगोकर उपर की हांडी के पेन्दे पर शीतलता पहुँचाने के लिए बार-बार बदल कर रखते है।इस तरह पारद नीचे से उडकर उपर की ओर हाँडी के भीतरी भाग में छोटे-2 कणो के रूप में चिपक जता है।स्वांग शीतल होने पर धीरे से यंत्र को उतार कर संधि को खोलकर उपरी हांडी में लगे पारद को ब्रश से साफ कर निकाल लेते है तत्पशचात एक स्वच्छ कपडे से छान लेते है। इस प्रकार उर्ध्वपातन संस्कार से पारद नाग और वंग दोष सें मुक्त हो कर निर्मल हो जाता है।

(ब) अधःपातन संस्कार-
शुद्ध आंवला सार गन्धक तथा पारद समान भाग लेकर जम्बीर नींबू के रस में एक दिन घोटकर कौंच के बीज, चित्रक, सहजन, राई और सेंधा नमक प्रत्येक को षोड़शांश चूर्ण के साथ इतना घोंटे कि पिट्ठी बन जाए, जिससे की पारद अलग न दिखाई दे। फिर इसे एक हंड़िका के भीतरी भाग में लेप करते है और इस हंड़िका के बराबर मुखवाली दूसरी हंड़िका में जल भर फिर पारद में लिप्त -हंड़िका को औंधा करके उसका मुख नीचे की जल-भरी हुई हण्डिका के मुख से मिलाकर मुल्तानी मिट्टी से सन्धि बन्द करके पृथ्वी मेंएक गडढा(जिसमें यह यंत्र पूरा बैठ सके, केवल उपरी हण्डिका का आधा भाग मात्र, दिखाई दे) खोदकर गाड़ दें।उर्ध्व हण्डिका के बाहर रहे भाग के चारों ओर तथा पीठ पर जंगली कण्डों की आंच देते है।इस तरह अग्नि के ताप से पारद नीचे शीतल जल में गिरेगा।स्वांग शीतल होने पर सावधानी से उपर की हण्डिका हटाकर नीचे की हण्डिका में से पारद निकाल लेते है।

(स) तिर्यक पातन संस्कार-
लोहे की बोतल (जिसमें पारद भरकर विदेशों से आता है) के मुख के भीतरी भाग में चूड़ी निकालकर उसमें पारद रखकर बोतल के मुख में पाईप को झुका कर बनाया हुआ दो फुट लम्बाई का बेन्ड फिट करके बेन्ड के दूसरे मुख से जल भरकर पात्र को लगा दें फिर उस बोतल को चूल्हे पर रखकर 8-9 घण्टे अग्नि देने पर पारद का तिर्यक पातन हो जाता है।

6. बोधन (रोधन संस्कार)-
उपरोक्त प्रकार से स्वेदन, मर्दन, उत्थापन तथा पातन संस्कारों से सुसंस्कृत किया हुआ पारद शक्तिहीन हो जाता है, अतः इनमें पुनः शक्ति लाने के लिए ही यह बोधन संस्कार किया जाता है। एक हँडी में पारद को रखकर, उपर से नींबू के रस में पिसे हुए सैन्धव नमक से ढक देते है और कुछ जल डालकर एक ढक्कन मुख पर रख मुख बन्द कर सन्धि लेप कर देते हैं इसके पश्चात इसे भूमि के बराबर इसका उपर का भाग रहे इस प्रकार गढ्डे में रखकर इसके उपर लधु पुट देने से बोधन संस्कार हो जाता है। तथा पारद शक्ति सम्पन्न हो जाता है।

7. नियमन संस्कार-
बोधन संस्कार द्वारा बलवान पारद की चंचलता दूर करने के लिए नियमन संस्कार किया जाता है। इसका प्रयोजन सिर्फ पारद की चंचलता दूर कर अग्निस्थायी करना है। इसके लिए सर्पाक्षी, इमली, बाँझ, ककोड़ा भाँगरा, धतूरा और नागरमोथा के स्वरस अथवा क्वाथ के साथ एक दिन स्वेदन करने से पारद क चंचलता दूर होकर पारद अग्निस्थाई बन जाता है।

8. दीपन संस्कार-
काँजी और चित्रकमूल क्वाथ से दोला यंत्र द्वारा तीन दिन तक स्वेदन करने से पारद का स्वेदन संस्कार हो जाता हैं। इस संस्कार से पारद की जारण शक्ति बढ जाती है।
शोधित पारद अन्दर की तरफ से नीली आभायुक्त व बाहर से मध्यान्ह सूर्य की तरह उज्जवल चमकदार होता है। परीक्षण हेतु एक काँच के पात्र में शुद्ध पारा रखकर उस पर उपर से पानी की तेज धार गिराने पर पारद के बुलबुले पानी की सतह पर तैरते दिखाई देती है एवं उसमें नीली आभा दिखाई देती है तथा वे बुलबुले फूटकर पुनः पारद के रूप में बदल जाते है।
शर्मायु द्वारा उपरोक्त विधि विधान से ही पारद को शोधन कर योगों का निर्माण किया जाता है। इसीलिए निर्मित योगों में किसी भी प्रकार की विषमयता (जवगपबपजल) न होकर पूर्णतः शुद्धता रहती है व निर्मित योग शरीर के लिए उपयोगी सिद्ध हुए है।

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