विषेष प्रक्रिया द्वारा पदार्थ का अग्नि के संयोग से प्राप्त पाउडर ही भस्म है।
भस्म का अर्थ राख नहीं है, भस्म तथा राख में महत्वपूर्ण यह अन्तर है कि भस्म, तेजस्वी, सूक्ष्म,वीर्यवान होने से तुरन्त फलदायक होती है।यह योगवाही होती है, अर्थात पच्यमानावस्था (पाचन काल) मे ही सांसर्गिक गुणों को ग्रहण कर लेती है।
भस्म बनाने में वानष्पतिक रसों का संयोजन धातु के साथ इस प्रकार कराया जाता है जिससे भस्म सेन्द्रिय बन जाती है।अर्थात भावना दी जा रही वनष्पति के गुण के साथ ही पदार्थ के गुण भी उसमें उपल्ब्ध रहते है तथा हमें इसकी अनुभूति होती है। भस्म निर्माण में स्वच्छ, कीटाणु रहित द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। निमार्ण विभिन्न क्रियाओ में किया जाता है।

 

शोधन

श्री षर्मा आयुर्वेद मन्दिर प्रतिष्ठान में भस्म निर्माण में किसी भी धातु-उपधातु (जैसे -स्वर्ण,चाँदी,ताम्र,लौह,वंगए, यशद ,नाग,स्वर्णमाक्षिक,रौप्यमाक्षिकए मण्डूर आदि) रत्न- उपरत्न (जैसे -हीरा, पन्ना,मोती,वैक्रन्त,माणिक्य,यत्रषंख,सीप आदि) रस-उपरस एवं खनिज पदार्थ जैसे-अभ्रक,गैरिक,कासास,फिटकरी आदि अनेक द्रव्यों का शोधन संस्कार शास्त्रीय विधि के अनुसार पूर्णतः विषुद्ध रूप से रसायनश्षाला में किया जाता है। शोधन भिन्न-भिन्न पदार्थों का भिन्न-भिन्न प्रकार की शास्त्रीय विधियों के अनुसार ही किया जाता है।इससे द्रव्यों के दोष दूर हो जाते है। व द्रव्य पूर्णतः शुद्ध हो जाता है तथा इसके गुणों में वृद्धि हो जाती है।द्रव्यों में बाहरी रूप से मिले हुए विजातिय द्रव्य नष्ट हो जाते है। साथ ही इसकी उग्रता,दाहकता नष्ट होकर लधुता सौम्यता,षीध्र पाचकता,सूक्ष्मता आदि विषिष्ट गुण भी उत्पन्न हो जाते है। कठोर द्रव्यों को प्रायःअग्नि में रक्त तप्त कर तिल तैल(जो कि पूर्णतः विषुद्ध रूप से प्राप्त कर व सूर्य की किरणों में 2-3 दिन रखने के पश्चात ही प्रयुक्त किया जाता है) तक्र,कांजी,गोमूत्र,व कुल्थी क्वाथ में 7-7 बार बुझाया जाता है। इसी प्रकार अलग- अलग द्रव्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार से शास्त्रोक्त ग्रन्थों में वर्णित विधियों के अनुसार ही शोधन संस्कार किया जाता है।

 

मारण
शोधन पष्चात, कुछ द्रव्य इतने म्रदु होते है कि छोटे-छोटे टुकडों के रूप में हो जाते है। तथा इमाम दस्ते से कूटने पर चूर्ण रूप में हो जाते है। ऐसे म्रदु द्रव्यों का तो इसी प्रकार चूर्ण कर उसमें जिस औषधि काढा या वनष्पति रस की भावना देनी है वह काढा या स्वरस मिलाकर उसे गीलाकर छोटी-छोटी टिकियों में बनाकर सुखाकर टिकियों को बुन्देलखण्ड की मिट्रटी से निर्मित एक सकोरा लेकर, टिकिया रख दूसरे सकोरे से ढंक कर संधिलेप कर यानि के सकोरों के बीच में स्पेस ना रहे अतएव उसमें कपड़ मिट्री का लेप लगाकर , पुनः सुखाकर अग्नि में पुट देने से उसका मारण अर्थात भस्मीकरण हो जाता है।

 

विशेष मारण
कठोर पदार्थ वंग(रांगा),याद(जस्ता), रौप्य (चांदी),स्वर्ण,ताम्र,अभ्रक,लौह,वज्र(हीरा) आदि अनेक प्रकार के ठोस पदार्थे का विषेष मारण किया जाता है। जिससे द्रव्य चूर्ण रूप में हो जाता है।तथा भस्म वनाने में पर्याप्त सुविधा हो जाती है।
धातु उपधातु की भस्म वनाने अथवा मारण करने का अर्थ इनके धातुत्व को बिलकुल नष्ट कर देना,ऐसा नहीं है,भस्म चाहे जितनी सूक्ष्म बनाई जाये फिर भी वह अपने मूल स्वभाव (प्राकृतिक गुण विषिष्ट) का त्याग नहीं करती अर्थात जिस धातु के गुणधर्म जो भी होते है। भस्म होने के बाद भी वो उसमें उपस्थित रहते है।साथ ही गुण वृद्धि हो जाती है क्योकि भिन्न-2 भावना द्रव्यों के संयोंग से उनके गुण धर्म भी द्रव्यों में आ जाते है। अत एव शर्मायु प्रतिष्ठान में निर्मित भस्में वनाते समय शास्त्रीय गृन्थों के अनुसार उसमें वर्णित वनस्पतियों का स्वरस मिलाकर 6 से 8 धण्टे तक कभी-कभी 2 से 3 दिन तक लगातार धुटाई करते हैं क्योकि जितनी धुटाई होगी भस्म भी उतनी अच्छी और बारीक बनेगी। पुनः टिकिया बनाते है।
पुट-पाक करते समय प्रायः जंगली उपलों का ही प्रयोग करते हैं जो जलने पर उचित अग्नि देते है। भिन्न-भिन्न भस्मों के निमार्ण में भिन्न-भिन्न प्रकार से पुटें दी जाती है।एवं अग्नि देने की व्यवस्था भी भिन्न-भिन्न होती है किसी औषधि मे लधु पुट देते है अर्थात कम अग्नि, किसी में अधिक अग्नि गजपुट और अत्यधिक अग्नि महापुट देते है। कोई भस्म 15 से 20 दिनों में निर्मित हो जाती है कोई लगातार 6 से 7 वर्ष तक चलती है जैसे लौह भस्म सहस्त्रपुटी अभ्रक भस्म सहस्त्रपुटी।
भस्म पूर्णतः निर्मित हो गई है अथवा अभी कच्ची है इसका परीक्षण भी अति आवश्यक है। हमारे यहाँ निर्मित भस्में निरूत्थ होती है यह विषेष परीक्षण द्वारा परखा जाता है। साथ ही भस्में (1) चमक रहित (2) रेखापूर्ण ;ूमद जांमद इमजूममद जीम पदकमग पिदहमत ंदक जीनउइ ंदक ेचतमंकए पज पे ेव पिदम ेव ें जव हमज मेंपसल पद जव जीम पिदहमत सपदमद्ध (3) वारितर ;ूमद ेउंसस ुनंदजपजल पे ेचतमंक वद बवसक ंदक ेजपसस ूंजमतए पज ेवनसक सिवंज वद जीम ेनतिंबम द्ध (4) अपुर्नभव ;ज्ीम इींउं ेवनसक दवज तमअमतज जव जीम वतपहपदंस ेजंजमद्ध होती है।
निर्मित भस्मों को शास्त्रीय पद्वति से जांचने के बाद आधुनिक वैज्ञानिक पद्वति से भी परीक्षण किया जाता है। सारे मापदंड पूर्ण होने पर ही भस्म को विक्रय हेतु पैक किया जाता है।
भिन्न-भिन्न भस्मों की उपयोगिताऐ भी अलग-2 है। जिनका वर्णन श्री शर्मा आयुर्वेद मन्दिर द्वारा प्रकाषित आयुर्वेद विज्ञान गुणधर्म एवं परिचय का अवलोकन करने से प्राप्त हो सकेगा।

 

स्वर्ण भस्म
वैदिक काल से स्वर्ण धातु का परिचय मिलता है। चरक व रस शास्त्रों में औषधि रूप में इसका प्रयोग पाया जाता है ग्रीक व अरबों ने भी इसका बहुतायात उपयोग किया है वर्तमान में एलोपैथी औषधियों में भी इसका प्रयोग किया जा रहा है।
ऐसा उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में राजा-महाराजा आदि स्वर्ण पात्र में ही भोजन सामग्री का प्रयोग करते थे क्योकि यह धातु जीवाणुरोधी है व शरीर की पौष्टिकता के लिए अति महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है। हमरे प्राचीन आचार्यो ने स्वर्ण भस्म का निर्माण किया जो कि औषधि के रूप में अकेले ही अथवा भिन्न-भिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों, द्रव्यों के संयोग से निर्मित योग के रूप में प्रयोग में लाई जा रही है।

 

स्वर्ण भस्म निर्माण

श्री शर्मा आयुर्वेद मन्दिर में स्वर्ण भस्म का निमार्ण पूर्णतः शास्त्रोक्त विधि के अनुसार ही कुषल वैद्यों द्वारा सुव्यवस्थित रसायनषाला में किया जाता है।

शोधन

सर्वप्रथम स्वर्ण बिस्कुट को, चूर्ण रूप में परिवर्तित करने हेतु एक कांच पात्र (फलास्क) मे हाईड्रोक्लोरिक एसिड व नाईट्रिक एसिड के संयोग से बने हुए योग एक्वारजिया में गलाने हेतु रख दिया जाता है। लगभग 1-2 दिन बाद इस मिश्रण को अग्नि में चढ़ाकर खौलाया जाता है,खौलते-खौलते जब मिश्रण का तरल एक तिहाई रह जाता है तब इसमें हरे काशीश से बने हुए विषेष प्रकार के घोल को इसी गरम अवस्था में धीरे -2 क्रमषः तब तक डाला जाता है जब तक स्वर्ण चूर्ण काँच पात्र की तली पर पूर्ण रूप से न बैठ जाए। पष्चात पात्र के ठण्डा होने पर अगले दिन सावधानी पूर्वक तलस्थ स्वर्ण चूर्ण को किसी अन्य पात्र में निकाल लेते है। तथा इसकी धुलाई निरंतर तब तक करते रहते है जब तक अम्ल का अंषपूर्णतः निकल न जाए व धुलाई बाद पानी स्वच्छ आने लगे। अब इसे सुखाकर विषेष शोधन हेतु रखते है।

 

विषेष शोधन

उपरोक्त स्वर्ण चूर्ण को एक विषेष प्रकार के पात्र मूषा में रखकर तथा इस मूषा को अग्नि में रख, स्वर्ण चूर्ण को गर्म कर विषुद्ध तिल तैल (जो कोल्हू से निकलवाकर तथा एक दो दिन धूप में रखकर पुनः छानकर प्रयोग में लेते है।) तक्र, कांजी, गोमूत्र, व कुल्थी क्वाथ में कमषः 7-7 बार बुझाते है। पुनः गर्म जल से धोकर सुखाकर भस्म निर्माण करते है।

 

भस्म निर्माण

शेधित स्वर्णचूर्ण से आठ गुना शोधित पारा एक खरल (ग्राईडिग पैन) में लेकर इसमें स्वर्ण चूर्ण गला दिया, अब इसमें पारे से दुगना शोधित गंधक मिलाकर कज्जली बनाई(कज्जली का निर्माण पारा व गन्धक को आपस में मिलाकर लगातार धुटाई करने के पचात काले रंग का एक यौगिक प्राप्त होता है यही कज्जली है) इस कज्जली को एक दिन लाल पुष्प वाले कपास पुष्प के रस से व एक दिन ग्वारपाठे के रस में मर्दन (घुटाई) कर सुखाकर कपडमिट्टी की हुई कांच कूपी में एक तिहाई भरकर कूपीपक्व भट्टी में मृदु-मध्यम व तीक्ष्ण अग्नि देते हुए चन्द्रोदय का निर्माण किया। अग्नि शीतल होने पर अगले दिन कांच कूपी में तलस्थ (नीचे तली पर एकत्रित स्वर्ण चूर्ण को सावधानीपूर्वक कांच कूपी को तोडकर निकाल लिया।
प्राप्त मुलायम स्वर्ण चूर्ण को एक खरल(ग्राईडिग पैन) में डालकर, इसमें लगभग समभाग शुद्ध संखिया मिलाकर तथा तुलसी पत्र स्वरस मिलाकर लगातार 7 दिन तक घुटाई की पुनः इसकी टिकिया बनाकर सुखाकर रखा। अब एक मिट्टी के सकोरे में तुलसी पत्र का कल्क (चटनी) लेकर उसके उपर टिकिया रख, पुनः टिकिया के उपर तुलसी कल्क रखकर, इस सकोरे को अन्य सकोरे से ढक दिया इसके संधिस्थान का 7 कपड़ मिट्टी कर (विषेष प्रकार की बुन्देलखण्ड में उपलब्ध पीली मिट्टी के घोल में कपडे को सानकर लपेटते है, यह सात सतह में करते है।) सुखाकर उपलों की मन्दाग्नि में पाक किया या पुट दी। पुनः अग्नि ठण्डी पड़ने पर, अगले दिन सकोरे से टिकिया निकालकर आधा शुद्ध संखिया मिलाकर उपरोक्त प्रकार से दूसरी पुट दी।अब तीसरी बार से भस्म बनने तक स्वर्ण मा़त्रा से चौथाई शुद्ध संखिया मिलकर उपरोक्त विधि से लगातार पुट दी। इस प्रकार 10-12 पुटों में प्रायः भस्म का निमार्ण हो जाता है।
हमरे प्रतिष्ठान में निर्मित स्वर्ण भस्म में विषेष गुण वृद्धि के लिए, शास्त्रोक्त गृन्थ सिद्ध योग संग्रह मतानुसार अन्तिम तीन पुटों में एक दिन गुलाब, एक दिन कमल व एक दिन मौलसिरी के पुष्पों के स्वरस की भावना देते है। इससे भस्म शीतल, सौम्य व मधुर रहती है। पुटों के प्रारंभ में अग्नि मन्द देते है, पुनः अग्नि सहने पर अग्नि बढाते जातें है। निर्मित भस्म का शास्त्रीय व आधुनिक वैज्ञानिक विधि द्वारा परीक्षण करने के उपरान्त भस्म को प्रयोगार्थ पैक किया जाता है।
स्वर्ण भस्म व उसके मिश्रण से निर्मित योग के उपयोग का विवरण श्री शर्मा आयुर्वेद मन्दिर द्वारा प्रकाषित आयुर्वेद विज्ञान गुणधर्म एवं परिचय में अवलोकित किया जा सकता है।

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